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सरपंच साहब का जादुई झाड़ू और खुशबू बिखरती नालियां*

व्यंग्य by खुशराज वैष्णव with AI
राजस्थान के गांवों में सफाई अब काम नहीं, एक कला बन चुकी है। और इस कला के महान कलाकार हैं—सरपंच साहब और उनका जादुई झाड़ू।
इस झाड़ू की खासियत ये है कि ये जमीन पर कम और फाइलों में ज्यादा चलता है। जहां आम झाड़ू कचरा हटाती है, वहीं ये जादुई झाड़ू कागज़ों में पूरे गांव को चमका देती है। गली चाहे जैसी हो, रिपोर्ट में हमेशा “स्वच्छता का मॉडल” ही रहती है।
यहां सफाई का असली मतलब है—काम से पहले घोषणा, काम के दौरान फोटो, और काम के बाद शाबाशी। झाड़ू पकड़ी जाती है, कैमरा चालू होता है, और उसी पल गांव स्वच्छ घोषित हो जाता है। झाड़ू को भी अब आदत हो गई है—उसे पता है उसका काम कचरा हटाना नहीं, इमेज बनाना है।
कचरे की भी अपनी समझ है। वो जानता है कि उसका कोई खतरा नहीं है। वो आराम से पड़ा रहता है, क्योंकि उसे भरोसा है कि सफाई उससे नहीं, रिपोर्ट से होने वाली है।
गांव में अब एक नया फॉर्मूला चल पड़ा है—
“जितनी बड़ी पोस्ट, उतनी बड़ी सफाई।”
और इस फॉर्मूले में हर बार कचरा हारता नहीं…बल्कि मजबूती से वापस जीत जाता है।

⭕ *यक्ष उवाच*
चुप मत बैठो—RTI लगाओ, ग्राम सभा में सवाल उठाओ, सोशल ऑडिट में हिसाब मांगो क्योंकि पैसा आपके टैक्स का है वरना झाड़ू सिर्फ फोटो में चलेगी और आपका पैसा किसी और की जेब भरता रहेगा।

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